Thursday, September 10, 2020

Kalras of Kasur & Firozpur


कालड़ा 
कसूर और फ़िरोज़पुर के 

आजकल  (02.09.2020 से 17.09 .2020 तक) पितृपक्ष है और यह समय पूर्वजों को याद कर श्रद्धा सुमन अर्पित करने  का है। कहा जाता है कि पितृपक्ष का श्राद करने  से दिवंगत आत्माओं को शांति एवं सद्गति प्राप्त होती है।  वैसे तो द्वादश पूर्वजों के प्रति श्राद करने का विधान है।  यानी कि 6 पूर्वज मातृपक्ष के एवं 6 पूर्वज पितृपक्ष के।  परन्तु परंपरा है कि पितृपक्ष में तीन पीढ़ीओं के पूर्वजों तक को तो नित्य स्मरण रखना चाहिए और पितृपक्ष के दिनों में  उनके प्रति श्राद एवं तर्पण किया जाता है। 

तीन पीढ़ी तक तो पूर्वजों का मुझे ध्यान एवं स्मरण भी है।  परन्तु इस के पहले की पीढ़ीओं का पता करने के लिए हरिद्वार में स्थित आपने पण्डा जी से मुलाक़ात के दौरान पता किया।  

हमारे पिता श्री रतन लाल  जी तीन भाई और एक बहन हुए।  सब से बड़ी थी श्रीमती लीला देवी जी (1920 -1988)। श्री हरबंस लाल जी (1925 - 2010) दूसरे नंबर पर और उन की पत्नी  श्रीमती कौशल्या देवी जी (1930-1988) हुई जो फ़िरोज़पुर के गुलाटी परिवार से थी।  श्री रतन लाल जी (1927- 2018) और उनकी पत्नी श्रीमती स्वर्ण लता जी (1932 -1988) हमारे पिता और माता जी हुए। श्रीमती स्वर्ण लता जी धर्मकोट के सेठी परिवार से थी। बाद में सेठी परिवार पहले मखु और फिर कोटकपूरा में आन बसे। सब से छोटे भाई थे श्री कृष्ण लाल जी (1930-1982) और उन के दो विवाह हुए।  श्रीमती सीता जी जोधपुर के मोंगा परिवार से थी और  उन  की 1963 में एक एक्सीडेंट में मृत्यु हो गई।  उसके पश्चात उनकी शादी श्रीमती रानी जी से हुई। वह फ़िरोज़पुर के कुमार परिवार से थी।  इन सब के  पिता जी हुए  लाला अमर नाथ जी (1900 -1965) और माता श्रीमति ______. उन के पिता जी हुए लाला किरपा राम  जी (1880- 1900) और माता श्रीमती इंदिरा देवी जी (1885 -1972), जिन्हें हम प्यार से भाभो कहते थे। भाभो जी का पियर कसूर के पास ही चूणिआं तहसील में सेठी परिवार था।   लाला किरपा राम जी के पिता श्री हुए श्री राधा मल  जी और उन के  पिता  हुए श्री दया सिंह जी।  श्री दया सिंह जी के पिता  हुए श्री बुध सिंह जी और उन के पिता  हुए श्री भगवान् सिंह जी।  श्री भगवान् सिंह जी विक्रमी सम्वत 1933 में हरिद्वार गए थे जिस के अनुसार 1793 वर्ष बनता है।  

इस प्रकार लगभग  200 वर्ष तक पूर्वजों के  नाम मैंने हरिद्वार में पण्डा  जी से पता किये।  हरिद्वार में पण्डा जी यह रिकॉर्ड संभाल कर रखते हैं।  यह बहुत अच्छी परम्परा है।  जो भी हरिद्वार तीर्थ यात्रा के लिए जाता है वहां आपने पण्डा जी के पास अपना और आपने पूर्वजों का नाम दर्ज करवा देता है।  वहां  यजमानो का वितरण पण्डा परिवारों में हो  रखा है।  उदाहरण के लिए हमारे परिवार को वहां कसूर के कालड़ा परिवार के नाम से जाना जाता है क्योंकि हमारे पूर्वज सब कसूर शहर से रहे हैं जो आजकल पकिस्तान में है।  और हमारा रिकॉर्ड एक पण्डा जी के पास है।  

कहा जाता  है कि कसूर शहर की स्थापना भगवान् रामचन्द्र जी के सपुत्र कुश द्वारा हुई।  इस तरह हम कुश और भगवान् रामचन्द्र  जी के वंशज ठहरे।यह भी परम्परा है की हमें आपने गोत्र का ज्ञान हो।  सनातन परम्परा के अनुसार हिन्दू सात ऋषिओं में से किसी की संतान हैं।  हमारा गोत्र कश्यप है।  जिस के अनुसार हम कश्यप महर्षि के वंशज हुए।  

परन्तु उपर्लिखित पूर्वजों के नाम जान कर ऐसा लगता है कि  सन 1700 ईसवी के आसपास हमारे कुछ पूर्वजों ने सिख धरम का आलिंगन भी किया।  यानी हमारे पूर्वज लाला राधा मॉल जी के पिता दया सिंह जी सिख रहे होंगे।  श्री दया सिंह जी के पिता श्री बुध सिंह जी और उन के पिता  श्री भगवान् सिंह जी भी सिख रहे होंगे।  

परन्तु यह तय है कि हमारे पूर्वज किसान थे। इस नतीजे पर मैं इस लिए पहुंचा हूँ क्योंकि 1947 में पकिस्तान बन जाने के उपरान्त हमारे परिवार को क्लेम करने पर फ़िरोज़पुर में खेती की लगभग 8 एकड़ ज़मीन कंपनसेशन के रूप में मिली थी  जो फ़िरोज़पुर के इच्छेवाल गाँव में थी।  जो किसान परिवार हमारी ज़मीन पर  कसूर में खेती करते थे वही परिवार इच्छेवाल में सँभालने लगे और जब परिवार ने इसे बेचने का निर्णय किया तो इन्ही परिवारों ने इसे खरीदा . 

ज़मींदारी को छोड़ कर हमारे पूर्वज लाला अमर नाथ जी ने बैंक में काम करना ठीक समझा।  इस के उपरान्त उन  के तीनो बेटे श्री हरबंस लाल जी, श्री रतन लाल जी और श्री कृष्ण लाल जी विभिन्न बैंक की नौकरी में गए।  एक समय ऐसा आया कि हमारा परिवार बैंक वालों का परिवार के रूप में जाना जाने लगा। कालड़ा परिवार ज़मींदारी से बैंक वालों का परिवार कैसे बना इस का ज़िक्र  करूगा।

लाला अमर नाथ जी ने पंजाब नेशनल बैंक लाहौर में Cash Contractor के साथ काम करना शुरू किया।  बैंक का कारोबार बहुत विश्वास का कारोबार होता है।  बैंक शब्द का शाब्दिक अर्थ ही  भरोसा है।  Bankability का मतलब है भरोसे का प्रतीक। बैंक में भी सब से ज़्यादा भरोसा नकदी का होता है। सब लोगों को आपने रूपए पैसे से प्यार होता है। वह इसे संभाल कर रखना चाहते हैं। घर पर चोरी होने का डर  रहता है।  बैंक विश्वास देते हैं की आप अपनी बचत  बैंक में जमा करवा दो तो  सुरक्षित तो रहेगी  ही और जब चाहो बैंक से वापिस ले सकते हो। यानि कि बैंक खाते में जमा रकम ऐसे ही है जैसे की जमाकर्ता की जेब में क्योंकि जब चाहे उस को पैसे मिल जाते हैं।   यही भरोसा है  जिस के कारण लोग अपनी सारी  बचत बैंक में  जमा करवा देते हैं। सन 1900 के आस पास भारत में बैंकोँ  का प्रचलन नया नया था।  अधिकांश बैंक अंग्रेज़ों द्वारा चलाये गए थे।पंजाब नेशनल बैंक की स्थापना 1895 में लाहौर के अनारकली बाजार में हुई थी।  देश के स्वतंत्रता सैनानिओं ने इस की स्थापना की थी जिस में लाला लाजपत राय  का नाम अग्रणी था। बैंक में नौकरी विश्वास के आधार पर दी जाती थी क्योंकि बैंक का व्यापार ही भरोसे का है।  उन दिनों परिवार की साख देख कर बैंक में नौकरी दी जाती थी और Cash Department में तो बहुत ही एहतिआत बरती जाती थी।  कालड़ा परिवार की समाज में साख अच्छी रही हो गी  कि लाहौर स्थित बैंक के  प्रधान कार्यालय  के तत्कालीन Cash Contractor ने बाऊ  जी को अपनी Team में लिया।  कुछ समय पश्चात वह खुद भी Cash Contractor बन गए।  समय आने पर 1946 बाऊ जी के सपुत्र श्री हरबंस लाल जी ने Imperial बैंक  में केशियर लग गए जो कि बाद में State Bank of India बन गया।  और फिर 1946/ 47  में पिता जी श्री रतन लाल जी कालड़ा पंजाब नेशनल बैंक फ़िरोज़पुर में चुन लिए गए।  अगस्त 1947 में देश का बटवारा हुआ।  बाऊ जी को जोधपुर का Cash Contract दिया गया।  वहां  उन्हों ने चाचा जी श्री कृष्ण लाल जी को भी अपनी टीम में ले लिया।  इस तरह परिवार के सब सदस्य बैंक की नौकरी में आ गए। 

जैसा मैंने पहले लिखा है कि उन दिनों बैंक नए नए थे।  लोगों को बैंक में विश्वास होने में समय लगता है।  वोह बैंक में काम करने वालों को तो जानते हैं परन्तु बैंक को पूरी तरह से नहीं जानते।  बैंक में अपनी जान पहचान के लोग देख कर लोगों को विश्वास हो जाता।  कई बार तो लोग घर में ही आ कर पैसे जमा करने के लिए कह देते और अगर पैसे निकालने होते तो भी घर आ जाते।  फटे पुराने नोट बदलने पर उनका विश्वास और भी बाद जाता।  शादी विवाह में नए नोटों की फरमाईश पूरी हो जाये तो क्या कहना।  इस तरह हमारा परिवार बैंक वालों के परिवार के नाम से मशहूर हो गया।   

सतीश कालड़ा 
बैंगलोर: 04.09.2020 










 

1 comment:

  1. Very nicely written Mamaji , Loved to read all entries, looking forward to page.

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