संस्कार ,संस्कृति, रीतिरिवाज़ हमें कोई थाली में नहीं परोसे जाते .... हमारे मांबाप उनको हर पल खुद जीते हैं अपने व्यवहार में , अपने आचरण में और फिर प्रसाद के स्वरूप हमें मिलते हैं !
हम पाँच बहन-भाई जिनकी उपज हैं .....
बीजी-पापाजी ——
बीजी —गौरा रंग —सादगी और सुंदरता की प्रतिमा -तीन भाईयों की इकलौती लाडली बहन — कर्त्तव्यपरायण — पापाजी की वफादार अर्द्धांगिनी — खाना बनाने में माहिर —आँखों पर गोल्डन चश्मा ओढ़े मानो किसी स्कूल की प्रिंसिपल हो —- और पांच बच्चों की ममतामयी माँ !!!!
बीजी की मां उनके बचपन में ही गुजर गई थी वो चार भाईयों की इकलौती बहन थी ! मगर ! तायीजी के भाई की तरह उनका भी एक जवान भाई भगवान को प्यारा हो गया था । बीजी की भाभियों ने कभी भी उन्हें मां की कमी महसूस नहीं होने दी । बहन भाई का रिश्ता कैसा होना चाहिए.... वो जीता जागता सबूत हैं । एक आवाज़ पर ऐसे आ खड़े होते थे जैसे पड़ौस में ही रह रहे हों । स्कूल की गर्मियों की पहली छुट्टी में ही हम बीजी के साथ कोटकपूरा नानके जाते और वहां खूब मस्ती करते । एक बार वहां बीजी स्टेशन पर चलती गाड़ी से नीचे उतरते हुए गिर पड़े । स्टेशन पर शोर मच गया ,’ लुगाई गिर गई ! लुगाई गिर गई ....’ कोई भागता हुआ आया और बड़े मामाजी को बताया कि आपकी बहन गिर गई है । मामाजी के साथ आधा शहर उनके पीछे-२ दौड़ता हुआ स्टेशन पहुंचा । सेठी परिवार की काफी धाक थी वहां ।
बीजी की उपस्थिती के बिना नानके परिवार का कोई भी फैसला अधूरा होता ....चाहे लड़की के लिए लड़का देखना हो या लड़के के लिए लड़की ।
पाकिस्तान बनने से पहले जहां घर की औरतों पर इतनी पाबंदी होती थी ... मगर वहां भाभोजी बाऊजी के राज में खुली आज़ादी थी । कई बार पापाजी नहीं जा पाते मगर बीजी तायाजी तायीजी के साथ सिनेमा देखने चले जाते । बीजी तायाजी को ‘भरा जी’ पुकारती थी और तायाजी बीजी की बहुत इज्जत करते थे ।
बीजी के हाथों में अजीब शफ़ा थी । उल्टे हाथ से भी कुछ बना दें तो वो पकवान इलाही हो जाता । स्वादिष्ट खाने का लुत्फ लेते हुए पापाजी अक्सर बोलते ,’आज देवलोक में घंटियां बज रही हैं ।’😁गट्टे की सब्जी और कड़े के गिलास में मक्खनवाली लस्सी का पूछो ही मत !!!!👍उनके हाथ के बनी टिंडे की सब्जी का स्वाद तो आज भी याद है ❤️
बीजी सिलाई में बहुत निपुण थे । हमारी यूनीफार्म , हमारे सलवार कमीज, पुरानी शरटस में से तकिए कवर बनाना .... स्वैटर बुनना .... कौन सी कला है जिसकी वो मालिक नहीं थीं ... और कौन सा गुण है जो उनके अंदर नहीं था !!!!!!हर लेडीज़ संगीत में जरा सी टेढ़ी गरदन करके ढोलकी बजाते और गौण (गाने) गाते .... ‘ इक पैसा ले जाओ जी इक पैसा .... धेला मोड़ लै आओ जी इक पैसा .....,,। गाजर दा मैं गेट बनावां मूली दा दरवाजा ..... !’.... कभी स्वांग बनते .... और वहां बैठीं सभी औरतें हंसी से लोटपोट हो जातीं ! 😁😁😁
पापाजी बीजी एक दूसरे का ख्याल रखते ... एक दूसरे से पूछते , ‘मैंकिया जी ! तुसीं दवाई लीत्ती .....,?’ मगर ! आजतक यह समझ नहीं आया कि यह ,’मैंकियाजी’ होता क्या है ....कौन से शब्दकोष से लिया गया है ????😁😁😁
पापाजी की थोड़ी तनख्वाह में भी बीजी ने बड़ी शान और मान से घर को चलाया ,रिश्तेदारी में सम्मानपूर्वक लेनदेन भी किया । और हम बच्चों की पढ़ाई पर भी खर्च किया । अपने सास ससुर की इज्जत की और हम बच्चों से और अपने मायकेवालों से भी करवाई ।
मज़ाकिया इतने थे कि पूछो मत ...... अपने उम्र की सहेलियों के साथ तायीजी चाचीजी के साथ मज़ाक करने में काफी आगे निकल जाते !😁
मैं शुरू से ही जिद्दी रही हूं । किसी बात पर रूठ जाती । खास करके जब कहीं बाहर जाना होता ।ऐन दहलीज पर पहुंचकर रूठ जाती। ... नहीं जाऊंगी ... अब कर लो करना है .... मुझे मनाते या गुस्सा करते ..... कोई नहीं होता ....,! मगर अंदर से धुकधुकी रहती कि अगर छोड़ गए तो .....???? तो हथियार डाल देती । ...... वो भी क्या दिन थे !!!! अब तो कोई कम्बख्त मनाने वाला ही नहीं 😁😁😁और मैं इतनी सख्त रही हूँ कि बच्चों को रूठना तो क्या मुंह बनाने भी नहीं देती ।😁😁😁
अपने गहने उतार कर हम पांच बहन भाईयों की शादी की । मैं बीजी के एहसानों की ऋणी हूँ ...., मेरे चारों बच्चों की डिलवरी के वक्त और मेरे कठिन समय में मेरे साथ खड़े थे । और मैं खुद को एक अपराधी की तरह मानती हूँ मेरी वजह से या मेरे विवाहित जीवन में आए दिन उतार चढ़ाव से वो काफी दु:खी रहे !😢
When there is a committed and strong relationship between the two and in the retiring age, when the life partner is so important for survival and to carry on the old age , ..... क्या गुजरती है जब दोनों मेंसे एक रह जाता है ..... आधा-अधूरा !!!!!! किसी रिश्तेदार के यहां जाए या किसी फंक्शन में जाए परिवार होते हुए भी खुद को लावारिस सा पाता है । भुआजी आकस्मिक मौत की खबर के दो दिन बाद जब बीजी के जाने की खबर मुझे मिली तो मैं सकपका गई कि .... यह हो क्या रहा है । उस समय मैं बाहर लान में बैठी थी . नानू मेरी गोद में था । और मि बतरा हास्पिटल में थे पेट खराब की वजह से ।
समझ नहीं पा रही थी रोऊं या जाने का इंतजाम करूं ????? मगर जब मैं देहली से फिरोज़पुर पहुंची तो सबकुछ हो चुका और हमारी मां बिना मिले अग्नि की आहुति बन चुकी थी !!!!!😢
अगर पुनर्जन्म पर विश्वास करें .... तो जहां भी हों खुश रहें !!!!!🙏😢

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